राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता पर निबंध | National unity and integrity Essay in Hindi

Essay on National unity and integrity in Hindi :  इस लेख में हमने राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के बारे में जानकारी प्रदान की है। यहाँ पर दी गई जानकारी बच्चों से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं के तैयारी करने वाले छात्रों के लिए उपयोगी साबित होगी।

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 राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता पर निबंध : राष्ट्रीय एकता राष्ट्र की सुख-शान्ति और समृद्धि के लिए नितान्त आवश्यक है। यह राष्ट्र के विकास का चिन्ह है। इस के द्वारा राष्ट्रीय समस्याओं को शान्ति के साथ सुलझाया जा सकता है। राष्ट्रीय एकता ही राष्ट्र पर आने वाली विपत्तियों का डट कर सामना कर सकती है। यह राष्ट्र को सदृढ़ एवं समृद्ध बनाती है । राष्ट्रीय एकता की छवि से जो राष्ट्र मजबूत होते हैं, शत्रु उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचा सकते ।

राष्ट्रीयता का अर्थ 

 राष्ट्रीयता का अर्थ है - अपनी मातृ-भूमि से सच्चा प्यार करना और समूचे राष्ट्र के हित के बारे में सोचना । जब हम सारे राष्ट्र के बारे में सोचते हैं तब हम अपने स्वार्थों को त्याग देते हैं । यही राष्ट्रीयता राष्ट्र के चरित्र का निर्माण करती है और देश को खंड-खंड होने से बचाती है। यह हमें अनुशासन का पाठ पढ़ाती है और देशवासियों के साथ प्रेमपूर्वक रहने की प्ररेणा देती है । इस प्रकार सारे मोह-बन्धनों को छोड़कर धर्म, जाति, सम्प्रदाय, पार्टी या दल के हितों को त्याग कर राष्ट्र-प्रेम की पावन गंगा में स्नान करना ही राष्ट्रीय एकता कहलाती है।

 जननी जन्म-भूमि से प्रेम :- 

लंका पर विजय पाने के पश्चात् लक्ष्मण के मन में भले ही सोने की लंका को देखकर मोहभाव उत्पन्न हो गया था, लेकिन श्रीराम ने लक्ष्मण से यही कहा था कि मुझे सोने की लंका अच्छी नहीं लगती क्योंकि जननी जन्म-भूमि स्वर्ग से बढ़ कर है।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

जब हम भारतवासी अपनी प्रान्तीयता, जातीयता, तथा प्रादेशिक भाषागत प्रेम को त्याग कर सारे राष्ट्र के बारे में सोचेंगे तभी हमारे अन्दर राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न होगी। क्षेत्रीयता की भावना अलगाववाद की जननी है और राष्ट्रीय एकता के मार्ग मे बाधा का काम करती है।

धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण की आवश्यकता 

राष्ट्रीय एकता की सबसे बड़ी आवश्यकता है धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण । भारत में हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई - ये चार धर्म प्रमुख रूप से हैं । जहाँ तक धार्मिक दृष्टि से पूजा-अर्चना और प्रभु-भक्ति में विश्वास की बात है, उससे राष्ट्रीय एकता को कोई क्षति नहीं पहुँचती । राष्ट्रीय एकता को क्षति पहुँचती है राजनीति से।

राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता पर निबंध | National unity and integrity Essay in Hindi
राजनीति में आकर धर्म और धर्मावलम्बी अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में बंट जाते हैं। संपूर्ण राष्ट्र की दृष्टि से हिन्दू बहुसंख्यक है और मुसलमान, सिख और ईसाई अल्पसंख्यक है। यदि प्रसंगानुसार देखे तो मुसलमान जम्मू-कश्मीर राज्य में, सिख पंजाब प्रांत तथा ईसाई नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल और मिजोरम में बहुसंख्या में है परन्तु यहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक है। राजनीतिक दृष्टि से अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का बंटवारा राष्ट्रीय एकता विरोधी है। अतः प्रत्येक भारतवासी को धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण अपना कर अपने विरोधी धर्म और धर्मावलम्बियों की भावनाओं का आदर करना चाहिए ।

अल्पसंख्यकों की समस्या 

 स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् अल्पसंख्यको तथा पिछड़ी जातियों के हितों की सुरक्षा के लिए आरक्षण और विशेषाधिकारों की व्यवस्था की गई थी। धीरे-धीरे ये जातियाँ इसकी आदी बनती जा रही है। कुछ अन्य जातियां भी आरक्षण की सुविधाएं प्राप्त करने के लिए संघर्ष करने लगी है। अन्य जातियों में इस से विक्षोभ और कुण्ठा उत्पन्न होने लगी है। उधर राजनीतिज्ञ इसका लाभ उठाकर लोगों में जातीय और क्षेत्रीय प्रेम उत्पन्न करने का प्रयास करते रहते हैं। वोटों की राजनीति राष्ट्रीय एकता के लिए नितान्त घातक है। सच्चाई तो यह है कि जब तक अल्पसंख्यक राष्ट्र की मुख्यधारा में लीन नहीं होते और लगातार स्वतंत्र अस्तित्व की बात करते रहेंगे तब तक राष्ट्रीय एकता का लक्ष्य एक सपना बनकर रह जायेगा।

राष्ट्र-भाषा की आवश्यकता 

राष्ट्रीय एकता की बहुत बड़ी पहचान है - राष्ट्रभाषा।
सम्पूर्ण राष्ट्र की एक राष्ट्रीय भाषा हो, वह अनिवार्य है। भारत की राष्ट्रभाषा अटक से कटक और हिमालय से कन्यकुमारी तक विशाल राष्ट्र को एक सूत्र में पिरो सकती है। संविधान ने हिन्दी को राजभाषा माना। भारत की राजनीति ने राष्ट्रीय एकता के इस सूत्र को अपमानित करके छोड़ दिया। श्री मस्तराम कपूर का कहना है-राष्ट्रीय एकता की प्रतीक हिन्दी की बात करने वालों को संकीर्णतावादी कहकर गालियां दी जाती है और दो हाई प्रतिशत जनसंख्या के कैरियरबाज तबकों को जोड़ने वाली तथा उनके हित को साधने वाली अंग्रेज़ी की वकालत करने वाले राष्ट्रीय एकता के पुजारी बन गए। इससे बढ़कर राष्ट्रीय एकता की विडम्बना क्या हो सकती है?

 देश-प्रेम का अभाव 

जब हम परतन्त्र थे, तब हमारे अन्दर देश-प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। उस समय प्रान्तीयता का जहर या प्रेम अथवा धर्मान्धता आदि की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता था। उस समय हमारा एक ही नारा था- हिन्दुस्तान हमारा है। लेकिन आज हम पंजाब या मद्रास या हरियाणा की बात करते है।
राष्ट्र की चिन्ता करने वाले बहुत कम भारतीय है। हम पहले अपने धर्म अथवा जाति के बारे में सोचते हैं फिर हम राष्ट्र की बात करते हैं। हम प्रसिद्ध कवि इकबाल की ये पक्तियों भूल चुके हैं :
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दुस्तान हमारा ।।
अतः आज समय की माँग यह है कि क्षेत्रीयता, प्रान्तीयता, धार्मिक संकीर्णता और भाषागत  मोह से ऊपर उठ कर समूचे राष्ट्र के बारे में सोचे, तभी राष्ट्रीय एकता का सपना साकार  होगा।

राष्ट्रीय एकता के उपाय 

राष्ट्रीय एकता हेतू समय-समय पर अनेक उपाय अपनाये गये हैं। हमारे राजनीतिज्ञ भी नारे लगाते रहते हैं। लेकिन उनकी कथनी और करनी में तो जमीन आसमान का अन्तर है। अब गान्धी जैसे नेता तो रहे नहीं जिन्होंने हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का सन्देश हमें दिया था। अब तो कुछ सरंचनात्मक उपाय हमें अपनाने पड़ेंगे । 
सर्वप्रथम स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय एकता सम्बन्धी प्रयत्न किये जाने चाहिए । विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय एकता सम्बन्धी सामग्री होनी चाहिए, ताकि हमारे बच्चों में देश-प्रेम की भावना उत्पन्न हो । दूसरा धर्म को राजनीति से दूर रखना होगा। हमारे राजनीतिज्ञों को भी ध्यान रखना होगा कि वे अपने लघु स्वार्थो के लिए लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ न करें और राष्ट्रीय एकता के लिए प्रयास करें। इसके साथ-साथ बढ़ती हुई जनसंख्या, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, अशिक्षा, आर्थिक विषमता आदि की ओर भी ध्यान देना जरूरी है। इन समस्याओं के कारण भी राष्ट्रीय एकता खतरे में है।

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