पंचायती राज संस्थायें : पंचायत, पंचायत समिति एवं जिला परिषद | Panchayati Raj Institutions - Panchayat,Panchayat Samiti & Zila Parishad

पंचायती राज संस्थायें : पंचायत, पंचायत समिति एवं जिला परिषद | Panchayati Raj Institutions - Panchayat,Panchayat Samiti & Zila Parishad

 प्रिय, पाठकों आज के इस लेख में हम पंचायती राज संस्थाओं(PRIs) के बारे में जानकारी दे रहे हैं। इस लेख में हमने पंचायती राज संस्थाओं से सम्बन्धित जिन बिंदुओं पर चर्चा की है, वे इस प्रकार हैं :-

  • पंचायती राज  क्या है (Panchayati Raj  in Hindi)

पंचायती राज संस्थायें : पंचायत, पंचायत समिति एवं जिला परिषद | Panchayati Raj Institutions - Panchayat,Panchayat Samiti & Zila Parishad || PRIs


भारत गावों में बसता है। गांवों का विकास ही वास्तव में भारत का विकास है। भारत एक लोकतन्त्रात्मक गण राज्य है। लोकतन्त्र को सुदृढ़ करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई है। यह व्यवस्था लोकतन्त्र की प्राथमिक पाठशाला है। गांधी जी गांव के विकास में लोगों की भगीदारी को सुनिश्चित करना चाहते थे। संविधान के 73वें संशोधन के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। इस समय देश के अधिकांश प्रदेशों में पंचायती राज लागू है। इस की स्थापना सब से पहले राजस्थान में 2 अक्तबर 1959 को हुई। 1968 के अधिनियम के अन्तर्गत 15 नवम्बर 1970 को हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज को लागू किया गया।

पंचायत राज क्या है?

पंचायत राज वह व्यवस्था है जिस में गांव के लोगों को गांव के प्रशासन और विकास का अधिकार दिया गया है। लोग अपनी इच्छा और आवश्यकता से अपना विकास कर सकते हैं। यह तीन स्तरीय ढांचा है। सब से नीचे के स्तर पर ग्राम पंचायत है। खण्ड स्तर पर ब्लॉक समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद है।

1. पंचायत :- पंचायत की स्थापना ग्रामीण स्तर पर की गई है। इस का चुनाव गांव के व्यस्क मतदाओं द्वारा किया जाता है। गांवों को वार्डों में बांटा गया है। प्रत्येक वार्ड का प्रतिनिधि पंच या वार्ड मैम्बर कहलाता है। हिमाचल प्रदेश में पंचायतों में 50% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई हैं। कुछ सीटें अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जन जाति के सदस्यों के लिए आरक्षित होती है। सारी पंचायत के लोग प्रधान व उप-प्रधान का चुनाव सीधे तौर पर करते हैं। पंचायत में कम से कम 5 सदस्य होने चाहिए। पंचायत के सभी व्यस्क मतदाताओं को मिला कर ग्राम सभा बनती है। इस की बैठक साल में बार होती है। जिस में ग्रामीण स्तर पर किए गए कार्यों का ब्यौरा दिया जाता है व अगले विकास कार्यों पर चर्चा होती है। इन बैठकों में लोग बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं। ग्राम पंचायत अपने कार्यों के लिए ग्राम सभा के प्रति उत्तरदायी है। ग्राम पंचायत का चुनाव पांच वर्ष के लिए होता है।

2. पंचायत समिति :- पंचायत समिति का गठन ब्लाक अथवा खण्ड स्तर पर किया जाता है। पंचायत समिति के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान द्वारा ही किया जाता है। यह चुनाव पंचायत चुनाव के साथ ही सम्पन्न होता है। पंचायत समिति की रचना प्रत्येक राज्य में अलग-अलग है। खण्ड विकास अधिकारी (B.D.O.) पंचायत समिति का कार्यकारी अधिकारी होता है ब्लाक स्तर पर विकासात्मक कार्यों की चर्चा व नियोजन समिति का कार्य है। समिति का चुनाव पांच वर्षों के लिए किया जाता है। कृषि, पशु पालन, सिंचाई आदि की सारी योजनाएं इसी समिति का कार्य है।

3. जिला परिषद :- जिला परिषद का चुनाव भी पंचायत व पंचायत समिति के चुनाव के साथ ही सम्पन्न होता है। जिला परिषद का कार्यकाल भी 5 वर्ष का होता है। कुछ पंचायतों को मिलाकर जिला परिषद का एक वार्ड बनता है प्रत्येक वार्ड से एक सदस्य चुना जाता है। यहां भी महिलाओं, अनुसूचित जाति अथवा जनजाति के सदस्यों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं। जिला परिषद के लिए चुने हुए सदस्यों के अतिरिक्त उस क्षेत्र के लोकसभा सदस्य, विधान सभा सदस्य व पंचायत समिति के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष जिला परिषद के पदेन सदस्य होते हैं। प्रत्येक ज़िला में एक जिला परिषद का गठन किया गया है। जिलाधीश भी जिला परिषद का पदेन सदस्य होता है। जिला परिषद पंचायत समितियों से तालमेल पैदा करती है व उस के कार्यों की देखभाल करती है।

73वें संवैधानिक संशोधन की मुख्य व्यवस्थाएं :-

73वां संविधान संशोधन दिसम्बर, 1992 में लोक सभा व राज्य सभा में पारित हुआ। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर इसे संवैधानिक दर्जा दिया गया। इस की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है:

1. ग्रामीण स्तर पर लोकतान्त्रिक संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुई।

2 ग्राम सभा और ग्राम पंचायत को परिभाषित किया गया। ग्रामीण क्षेत्र में आने वाले सभी व्यस्क मतदाता ग्राम सभा के सदस्य हैं तथा उन के द्वारा विभिन्न

वार्डों से चुने गए सदस्य ग्राम पंचायत है।

3. पंयायत, पंचायत समिति तथा जिला परिषद - तीन स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था है।

4. पंचायत को वार्डों में बांटा गया। प्रत्येक वार्ड से एक सदस्य व्यस्क गुप्त मतदान द्वारा चुना जाता है तथा ये चुनाव राज्य चुनाव आयोग की निगरानी में होते हैं।

5. चुनाव क्षेत्रों में आने वाले विधान सभा व लोकसभा के सदस्य पंचायत समिति व जिला परिषद के पदेन सदस्य होते हैं और इन्हें बैठकों में वोट देने का

अधिकार होता है।

6 पंचायत, पंचायत समिति प जिला परिषद के अध्यक्ष को निश्चित कार्यकाल से पहले भी पद से हटाने की व्यवस्था की गई है। पंचायत प्रधान (अध्यक्ष)

के विरुद्ध यदि ग्राम सभा के 50% सदस्य प्रस्ताव पारित करें तो उसे पद से हटाया जा सकता है। पंचायत समिति और जिला परिषद में कुल सदस्यों का दो तिहाई बहुमत अध्यक्ष को पद से हटाने का प्रस्ताव पारित कर सकते हैं।

7. महिलाओं को कम से कम 1/3 सीटें आरक्षित होंगी। अनुसूचित जाति वन जन जाति के सदस्यों को भी सीटें आरक्षित की गई हैं। हिमाचल प्रदेश ने

महिलाओं के लिए 50% सीटें आरक्षित की हैं।

8. पंचायती राज संस्थाओं की कार्य अवधि 5 वर्ष होगी।

9. चुनाव लड़ने के लिए वही योग्यताएं निर्धारित की गई है। जो विधान सभा सदस्य के लिए हैं। 21वर्ष से कम आयु का चुनाव नहीं लड़ सकता है। 

10. पंचायतों की शक्तियां और काम के क्षेत्र निर्धारित किए गए । कृषि, पशुपालन, लघु उद्योग, शिक्षा, पीने का पानी आदि 29 विषय है जो इनके कार्यक्षेत्र में आते हैं।

11.इन को कुछ कर लगाने और उसे इकट्ठा करने की शक्तियों भी दी गई।

12. पंचायतों के चुनाव विवादों को अदालतों के हस्तक्षेप से बाहर रखा गया।














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